काली त्रालोक्य विजय कवच || काली त्रैलोक्य विजय कवच
यह कवच जो सभी इच्छाओं को पूरा करता है, उसे श्रीत्रैलोक्य विजय श्रीकालिकाकवचम या श्रीत्रैलोक्य कवचम या काली त्रैलोक्य विजय कवच या महाकाली त्रैलोक्य विजय कवच के नाम से जाना जाता है।
|| काली त्रालोक्य विजय कवच ||
श्रीसदाशिव उवाच -
कथितं परमं ब्रह्म प्रकृतेः स्तवनं महत् ।
आद्याः श्रीकालिकायाः कवचं श्रुणु सम्प्रतम् ॥ १॥
त्रैलोक्यविजयस्य कवचस्य ऋषिः शिवः ।
आहेतदोऽनुष्टुब्देवता च आद्या काली प्रकीर्तिता ॥ २॥
मायाबीजं बीजमिति रमा शक्त्तिरुदाहृता ।
क्रीं कीलकं कामसिद्धौ वियोगः प्रकीर्तितः ॥ ३॥
|| अथ श्रीत्रैलोक्य विजय श्रीकालिकाकवचम् ||
ह्रीं आद्य मे शिरः पातु श्रीं काली वदनमं,
हृदयीं क्रीं परा शक्तिः पायांत कंठं परा । १ ॥
नेत्रौ पातु जगद्धात्री करनौ रक्षु शंकरी,
घ्रान्नम पातु महा माया रसानां सर्व मंगला ॥ २॥
दन्तान रक्षु कौमारी कपोलो कमलाल्या,
औष्ठांधारौं शामा रक्षेत चिबुकं चारु हासिनि ॥ ३॥
ग्रीवां पायात क्लेशानी ककुत पातु कृपा मय,
द्वौ बाहुबाहुदा रक्षेत करौ कैवल्य दायिनी ॥ ४ ॥
स्कंधौ कपर्दिनी पातु पृष्ठं त्रिलोक्य तारिणी,
पार्श्वे पायादपर्न्ना कोटिम मे कम्त्थासना ॥ ५॥
नभौ पातु विशालाक्षी प्रजा स्थान प्रभावती,
उरू रक्षु कल्ले पादौ मे पातु पार्वती ॥ ६ ॥
जयदुर्ग-वतु प्राणान सर्वागम सर्व सिद्धिना,
रक्षा हीनां तू यत स्थानं वर्जितं कवचेन च ॥ ७ ॥
इति ते कथितं दिव्य त्रिलोक्य विजयाभिधम,
कवचम कालिका देव्या आद्याह परमादभुतम ॥ ८ ॥
पूजा काले पठेद यस्तु आद्याधिकृत मानसः,
सर्वान कामानवाप्नोती तस्या सुप्रसीदती ॥ ९॥
मंत्र सिद्धिर्वा-वेदाषु किराह शुद्रसिद्धयः,
अपुत्रो लभते पुत्र धनार्थी प्रप्नुयाद धनं ॥ १० ॥
विद्यार्थी लभते विद्याम कामो कामानवपनुयात
सहस्त्रावृति पाठेन वर्मन्नोस्य पुरस्कृती ॥ ११ ॥
पुरुश्चरन्नम यथोक्त फलदं भवेत्,
चंदनागरू कस्तुरी कुम्कुमै रक्त चंदनै ॥ १२ ॥
भूर्जे विलिख्य गुटिकार्नस्याम धार्येद जर,
शिखायां दक्षिणे बा़ो कंठे वा साधकः कटी ॥ १३ ॥
तस्या कालिका वश्या वांछितार्थ प्रयछती,
न कुत्रापि भायं तस्य सर्वत्र विजयी कविः ॥१४॥
अरोगी चिरजीवी सतबलवान साधारण शाम,
सर्वविद्यासु निपुण सर्व शास्त्रार्थ तत्त्व वित् ॥१५॥
वशे तस्य माही पाला भोग मोक्षै कर स्थित,
कलि कल्मष युक्तानां निश्रेयस कर परम ॥ १६ ॥
इति महानिर्वाणतन्त्रे सप्तम
उल्लासे ५५-६६ श्लोकपर्यन्तं श्रीकालिकाकवचम् सर्वम् ।
काली त्रालोक्य विजय कवच समाप्त
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